कब तक हम विदेशो में छुपे आतंकवादियो पर दोष मड़ेगे
कब तक हम इन हमलो में छिपी अपनी कायरता से मुहँ मोड़ेगे
कब तक हम इंटेलिजेंस फैलुर का राग अलापेगे
कब तक हम राजनेतिक दलों पर दोषारोपण करेगे
कभी तो भीतर झांक के देखो, कभी तो ज़िम्मेदारी मान के देखो
कभी तो दलगत कुत्सित राजनीति से बाहर निकल कर देखो
क्यों सोचते हो की डोसिएर भेज देने मात्र से कोई मुल्क
आतंकी सोंप देगा, और अपनी ज़ग हँसी कराएगा
क्यों सोचते हो की कोई और देश तुम्हारी लड़ाई में साथ देगा
क्या तुमने कभी किसी और की लड़ाई में हाथ बटाया है?
कुछ चीज़े कभी मांग कर नहीं मिलती, उन्हें पाने के लिए
संघर्ष करना पड़ता है, अपनी अस्मिता के लिए लड़ाई
अहिंसा से ज्यादा अच्छी है.
विदेशी जमीन पर बेटे आतंकी तुम्हारी पहुँच से बाहर है
पर जो आतंक फेलाते है वो तो तुम्हारे अपने ही लोग है
अपने ही देश में है, क्यों नहीं उनसे निपटते पहले.
जिस सरकार को देशद्रोही को फाँसी देने के लिए जलाद न मिले
जिस सरकार को देशद्रोहियों और आतंकियों को बचाने के लिए
करोड़े रुपये खर्च करने पड़े, और जो सरकार जनता को छोड़ दे मरने को
ऐसे सरकार का बदल जाना ही बेहतर है, बदल जाना ही बेहतर है
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