मजदूर
आग के गोले सहते
य़े मजदूर
पहरा लगा है धूप का
आंधी और बरसात का
फिर भी य़े कार्यरत है
बेफिक्र, बेझिझक
श्रमकण टपकते है, धूल में
और गड़ जाते है वातानुकूलित
इमारतो की नीवों में,
ठेकेदार की क्रूर निगाहों से
डरी-सहमी मजदूरने भी लगी है
काम पर, बच्चों को रोता बिलखता छोड़ के
कूट रहे है अपनी ही हड्डियों को
इन पत्थरों से स्वयं ही-----
पर किसके लिए?
अपने लिए, तुम्हारे लिए
या उन भद्र पुरुषो के लिए
या अपने और अपने पास बड़ते
पेटों की दहकती आग बुझाने के लिए
मजबूर है खुद
अपने को गलाने के लिए
य़े मजदूर
जिन्हें उन इमारतों में
कभी घुसने भी नहीं दिया जायेगा
जिसकी नीवं में बहा है इनका पसीना
विनोद पासी "हंसकमल"
आग के गोले सहते
य़े मजदूर
पहरा लगा है धूप का
आंधी और बरसात का
फिर भी य़े कार्यरत है
बेफिक्र, बेझिझक
श्रमकण टपकते है, धूल में
और गड़ जाते है वातानुकूलित
इमारतो की नीवों में,
ठेकेदार की क्रूर निगाहों से
डरी-सहमी मजदूरने भी लगी है
काम पर, बच्चों को रोता बिलखता छोड़ के
कूट रहे है अपनी ही हड्डियों को
इन पत्थरों से स्वयं ही-----
पर किसके लिए?
अपने लिए, तुम्हारे लिए
या उन भद्र पुरुषो के लिए
या अपने और अपने पास बड़ते
पेटों की दहकती आग बुझाने के लिए
मजबूर है खुद
अपने को गलाने के लिए
य़े मजदूर
जिन्हें उन इमारतों में
कभी घुसने भी नहीं दिया जायेगा
जिसकी नीवं में बहा है इनका पसीना
विनोद पासी "हंसकमल"
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