ऐसे में कविता क्यों
न हो
जहाँ गगनचुम्बी देवदार और ताड़ के पेड़ हो
जहाँ हर और प्रहरी हिमालय की चोटिया हो
जहाँ हर और प्रहरी हिमालय की चोटिया हो
जहाँ हरे भरे पेड़ स्नान किये मग्न हो
जहाँ वादियाँ कोहरे की चादर ओढे हो
जहाँ घुमावदार ऊपर नीचे आती सड़के हो
जहाँ हर और शांति का आलम हो
जहाँ पक्षियों की चहक ही संगीत हो
जहाँ सुबह सबेरे दिनकर प्रकाशमान हो
जहाँ हर और घनघोर हरियाली हो
जहाँ पावों से पतों की चरमराहट सुनती हो
जहाँ हलकी गर्मी में वरुण मेहरबान हो
जहाँ प्रक्रति पूर्णता शबाब पर हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ विभिन्य फूलों की प्रजातियाँ खिलती हो
जहाँ जानवर भी चैन से भ्रमण करते हो
जहाँ झरनों में स्वच्छ पानी बहता हो
जहाँ हर शिखर पे देवो का वास हो
जहाँ पहुँच अपनी अपने से पहचान हो
जहाँ हवा पानी में प्रदुषण न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ रुक रुक बादल बरसते हो
जहाँ दिन में शाम हो जाती हो
और हर शाम शांति की चादर ओढ़े हो
जहाँ हर पल कुदरत रंग बदलती हो
जहाँ इन्द्र-धनुष भी दिखते हो
जहाँ छन छन के धूप बिखरती हो
जहाँ सतरंगी से बादल हो
और बादलों का ही ' कैनवस ' हो
जहाँ पूरी कायनात सांस लेती हो
जहाँ मानसिक असंतुलन न हो
जहाँ घुमावदार ऊपर नीचे आती सड़के हो
जहाँ हर और शांति का आलम हो
जहाँ पक्षियों की चहक ही संगीत हो
जहाँ सुबह सबेरे दिनकर प्रकाशमान हो
जहाँ हर और घनघोर हरियाली हो
जहाँ पावों से पतों की चरमराहट सुनती हो
जहाँ हलकी गर्मी में वरुण मेहरबान हो
जहाँ प्रक्रति पूर्णता शबाब पर हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ विभिन्य फूलों की प्रजातियाँ खिलती हो
जहाँ जानवर भी चैन से भ्रमण करते हो
जहाँ झरनों में स्वच्छ पानी बहता हो
जहाँ हर शिखर पे देवो का वास हो
जहाँ पहुँच अपनी अपने से पहचान हो
जहाँ हवा पानी में प्रदुषण न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ रुक रुक बादल बरसते हो
जहाँ दिन में शाम हो जाती हो
और हर शाम शांति की चादर ओढ़े हो
जहाँ हर पल कुदरत रंग बदलती हो
जहाँ इन्द्र-धनुष भी दिखते हो
जहाँ छन छन के धूप बिखरती हो
जहाँ सतरंगी से बादल हो
और बादलों का ही ' कैनवस ' हो
जहाँ पूरी कायनात सांस लेती हो
जहाँ मानसिक असंतुलन न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ अंधी दौड़ के तनाव न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ अंधी दौड़ के तनाव न हो
जहाँ पहुँच चेहरों पे खुशियाँ आती हो
जहाँ हर और कुदरत की हसीन पेंटिंग्स हो
ऐसे में कविता क्यों न हो,
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ बर्फ से ढके पहाड़ हो,
जहाँ पर्वत श्रंखलाये श्वेत वस्त्र धारी हो
जहाँ मुहँ से गर्म धुयाँ निकलता हो
जहाँ नल-कूपो में पानी जम जाए
जहाँ पेड़ों से बर्फ लटकती हो
जहाँ सांह सांह बहती हवाए हो
जहाँ प्रकति की गोद के सिवा कुछ न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो
जहाँ लोग निश्छल और सीधे साधे हो
जहाँ कम में गुज़ारा होता हो
जहाँ शोर शराबा और भग्दढ़ न हो
जहाँ अफरा-तफरी, मार काट कुछ न हो
जहाँ सादगी ही जीवन हो
ऐसे में कविता क्यों न हो
ऐसे में कविता क्यों न हो
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