Monday, 30 July 2012

कैलाश मानसरोवर की यात्रा

मानसरोवर और कैलाश पर्वत की यात्रा


शिव भक्तो का एक जत्था चला
दिल्ली से कैलाश-पर्वत  की  और
पर जत्थे में शामिल होने से पहले
यात्रियों नें  की बहुत मुशाकत
पहले ऑनलाइन फॉर्म भरे
और किया  इंतज़ार बेसब्री से 
फिर ५-६ किलोमीटर रोज  चल कर
किया स्वयं  को तैयार यात्रा के
फिर भी धुकधुकी लगी रही
कहीं हो ना जाए  मेडिकल में फेल
क्या होगा अगर हमारा कोई साथी
हो गया फेल, क्या नंबर लगेगा साथी का
हमारे ही ग्रुप में, कैसा होगा ग्रुप अधिकारी
और किस किस परदेस के  होगे संगी-साथी
मेडिकल टेस्ट्स पास हो जाने पर
और विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग हो जाने पर,  
चला स्वस्थ  भक्तो का  टोला, जगह जगह
अभिनन्दन हुआ और मिली आशीषे
कुछ असली तो अधिकांश दिखावटी
धारचूला  के बाद शुभारम्भ  हुआ यात्रा का
अथाह झरनों  के दर्शनों से  लाभान्वित हो
पहुंचे नारायण आश्रम, कर दर्शन आश्रम के
 यात्रा का पहला सफ़र शुरू हुआ  पैदल
अब चड़ना उतरना और चड़ना
है बस पगडण्डी पर
अब नहीं कोई गाड़ी साथ
बस है तो केवल पिठू और घोड़े
और साथियों क़ि बम बम बोले,
हर हर महादेव के नारों की गूंज
और मन मैं अथाह विश्वास शिव दर्शन का
पहुँच  सिर्खा,  आराम किया प्रकृति की गोद में
और चल दिए ब्रह्म महूरत गाला शिविर की और,
गाला शिविर पहुंचना न था खाला जी का घर
कितनी उच्ची चट्टानों पर से था गुजरना
बस ऊपर नीचे, नीचे ऊपर चड़ना और उतरना
गाला शिविर में रात कटी और ब्रह्म महूरत
में चल दिए बुद्धि शिविर की और,
बुधि शिविर का रास्ता था और भी ठेडी खीर
बस ॐ नमोह शिवः ,  हर हर महादेव और
बम बम बोले के नारों की सन्जीएव्नि में
कभी भीगे वर्षा में तो कभी भीगे पसीने में
बुधि पहुँचते पहुंचते कईयों के बज गए बारह
पर अभी तो शुरुआत थी, मुश्किल  भी  था वापस  आना
कठिन मार्ग और सायें सायें गूंजती  काली नदी
मार्ग इतना कठिन की गलती से भी पावँ छूटा
तो मिलता नहीं कुछ भी शेष,  काट काट  कर
पर्वतो को, बनाया गया संकरा रास्ता, और उस
पर भी  मिला  टूटा फूटा  बहुत   संकरा रास्ता
आगे जाने की हिम्मत नहीं, पीछे आने का मार्ग नहीं
ऊपर पहाड़, नीचे कलकल करती काली नदी की पुकार
जवानों की सहातया  से किया रास्ता पार
निर्मल पानी के  विशाल झरनों में भीगते भागते 
सफ़र य़े पूरा हुआ तो आयी  जान में जान 
सुना यही था इसी रास्ते से पांडव कभी निकले थे
स्वर्ग लोक की और, अवशेष तो कुछ नहीं मिले खास,
पर देखने में  मिला, कुछ दूर साथ छोड़ने के लिए
हर गावं से चल पड़ता था एक कुत्ता,  और अपनी सीमा
पर छोड़ विलुप्त हो जाता था वो दूत 
पर अभी सफ़र कहाँ हुआ था पूरा
अभी तो चडनी थी कई  और चोटियाँ
जिसका सफ़र शुरू हुआ था  बुधि से गुंजी तक
यह पथरीला मार्ग, और उसकी उच्चाई
अच्छे अच्छों के पसीने  गए थे  छूट 
पर हर शर्दालू के मुख मंडल पर चमक रहा  था एक 
अद्भुत  तेज और गूँज रहा था हर तरफ
ॐ नमोह शिवः और हर हर महादेव के नारे
गुंजी में  था दो रोज का पड़ाव,
और वहाँ से दिखती थी  अनपुर्ना  की चोटियाँ
जो  भोगोलिक  दृष्टिकोण से थी  नेपाली सीमा में 
और दिखते थे विशालकाए पहाड़, 
हरियाली साथ छोड़ने  लगी थी
बर्फीले  हवाए लगी थी छूने
होने लगा था एहसास उच्चाई का
गुंजी में एक और मेडिकल टेस्ट हुआ,
कुछ फेल हुए, पर अधिकतर पास हुए
जो फेल हुए उनके थे चेहरे उतरे हुए
क्योंकि इतने पास आकर भी वो नहीं
उन्हें गम था न दर्शन कर पाने का
 न की वापस उन दुर्गम रहो पर जाने का
अब था भारतीय  सीमा के आखरी पड़ाव को 
पार कर तिब्बत  में प्रवेश करना,
उसके लिए था ॐ पर्वत और  नाभिदांग से
होकर तकलाकोट था  जाना, 
सफ़र का सबसे कठिन मार्ग यहीं था,
नाभिदांग में था प्रातकाल ४ बजे पहुंचना 
और बर्फीली हवाए  इतनी तेज की
चंद  मिनटों  में हो जाए शरीर ठंडा
अब काफिला पहुंचा चीन  बन कर  उनका  मेहमान
पर वहाँ  कोई  नहीं समझता मेहमान को भगवान,
मार्ग दर्शक तो  मिला, पर मिली नहीं मुस्कान
खाना भी  मिला पर   मिली  नहीं  खातिरदारी 
अब १२ दिनों तक तक था चीन में प्रवास
मानसरोवर झील में स्नान  और करनी थी परिक्रमा
कैलाश पर्वत की, खाना भी खुद ही बनाना था 
और करनी थी अर्चना पूजा, भरना था बहुत सा
पवित्र जल, और दर्शन करने थे अपने 
आराध्य शिव-पार्वती के आलोकिक धाम के
कैलाश ढका था बर्फ से, लगता था
मानों  सन्यासी शिव नें सफ़ेद टोपी ली हो पहन

वहाँ बिताया हर एक  पल, बरसो के सुखों
से भी अनमोल  है, न आने का बंधन हो तो,
बस जाए कुछ रोज वहाँ,
वह धरा बहुत पवित्र है, 
वहाँ के दृश्य  मन  मोहक है

कण कण में शिव पार्वती बिराजे
और चमत्कारों के सबूत मिले
भर गंगाजल मानसरोवर का
भक्तो का टोला वापस लोटा

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