Thursday, 13 September 2012

सामाजिक उथल पुथुल का दर्पण है किताबे
किताबो में ज्ञान है, सभ्यता की पहचान है
 बस वो बल नहीं  जो  जुल्म देख बगावत कर सके

हर रोज कस्बो-शहरो में  छपती रहती है खबरे,
टी वी चनेलो पर  भी भरपूर दिखाई जाती है
अस्पतालों  के बाहर दम तोडती  जिंदगियो की,
लड़कियों की  लुटती अस्मत की,
बुजुर्गो और जवानों की  दिन दहाड़े हत्या की,
मजबूरी में बच्चों को बेचते माँ बाप की
पेवंद लगे फटे-पुराने कपड़ो में शीत लहर
के प्रकोप  से बचते असहाय   लोगों की,
पुलिस के  जुल्मो और लाठी चार्ज की,
स्वतंत्र देश में नारकीय जीवन जीते लोगों की


क्यों हमारा दिल नहीं पसीजता य़े सब देख
क्या य़े  किसी अज्ञात देश के शरणार्थी है 

पर अब इनका कोई  ज़िक्र नहीं होता किताबो में
कहाँ  लुप्त  हो गए वो अक्षर जो जोड़ते थे इनसे 
अब  छोड़ किताबो के ज्ञान को, समझना होगा
इस नव- भारत की  बिगडती तस्वीर का दर्द
इस  चमकते परिवेश के नीचे  फैले अंधेरो को,
उठाना होगा ऊपर प्यार-मोहब्बत की शायरी से
और जुड़ना होगा अपने हम वतनो  के दुःख दर्द से
सबकी हो  तरक्की,  और सबको मिले सम्मान  
 हम सब को  मिलकर ऐसे भारत को बनाना  ही होगा.

विनोद पासी "हंसकमल

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