Tuesday, 11 September 2012

बाढ़ (जल-विभिषका)



बाढ़  असम की हो या बिहार की
बंगाल की हो या उड़ीसा    की
रंग-रूप सबका एक सा ही होता है

जान-माल की  क्षति- पूर्ति  कम हो या ज्यादा
जात-पाँत  की सीमायों का बंधन भूल
हर ह्रदय में क्रंदन एक सा ही होता है

चंद टुकडो से क्षति-पूर्ति  क्या होगी?
बिछुड़ जाता है जब कोई अपना
जहाँ सबका एक सा ही बर्बाद होता है

भाषाई जंजालो में व्यथा चाहे न बंध पाए
तस्वीरो में बर्बादी शायद न समां पाए
पर पथराये नयन-औ-नीरो का
मतलब एक सा ही होता है

क्यूँ नहीं करते हम यह अमृत संचय?
बिछा के  जलाशयों  और कुओं  का जाल?
क्यों नहीं भरते हम अपनी पृथ्वी का गर्भाशय?
क्यों लाचार है अब तक प्राक्रतिक आप्दयों के सामने?

हम चाहे तो उपजायू कर दे सारी बंजर भूमि
हम चाहे तो स्वर्ग बना दे अपनी इस वसुंधरा को


विनोद पासी "हंसकमल"

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