Friday, 15 February 2013

हमें जानवर कह कर हमारी तौहीन मत करो
गिरेबान में झांको, कोई नया शब्द तलाश करो
पर हमें जानवर कह कर हमारी तौहीन मत करो

देखा है कभी हमें किसी का शोषण करते हुए
देखा है कभी हमें किसी का घर उजाड़ते हुए
देखा है कभी हमें वस्तुयों की होड़ करते हुए
देखा है कभी हमें अपने हाल पे शिकायत करते हुए

मुहं में जुबां नहीं, हाथों में शक्ति नहीं
रहने को घर नहीं, निबाले का भरोसा नहीं
फिर भी हम रहते है खुश हर हाल में
न होते है ग़मगीन, न करते कभी हम खुदकशी

न करते है क़त्ल किसी का इर्षा द्वेष से
न करते है किसी को घर से बेघर घमंड से
न पेट अपना भरा हो तो बात और है
पेट भरा हो तो मदद करते है साथी की

हमने तुम्हारे ह्रदय में छिपी कसक देखी
हमने तुम्हारे होटों पर कटु हसीं देखी
हमने तुम्हारे दिलो में भरी नफरत देखी
हमने तुम्हारे अन्दर बसी शेतानियत देखी

कुछ था ही नहीं कभी कुछ पास तुम्हारे
सीखते भी तो क्या, रह कर हम बीच तुम्हारे
हमने कभी नहीं चाहा, इंसान रूप मिले हमें
तुम डरते हो, कहीं हमारा रूप न मिले तुम्हे

अपनी पहचान के लिए कोई नया शब्द इजाद करो
पर हम तो तुम्हे ही जानवर कहते और समझते है
क्योंकि इंसानियत के गुण तो तुममे है नहीं
बस इतनी सी गुज़ारिश है सुन सको तो हमारी
हमें जानवर कह कर हमारी तौहीन मत करो

विनोद पासी "हंसकमल"

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