Tuesday, 2 April 2013


ताउम्र बीत गयी रिश्तो को संवारते -संवारते 
कब जिए अपने लिए, क्या कभी  कुछ याद है
बनते बिगड़ते, बिगड़ते संवरते, ये पारिवारिक रिश्ते
मर्यादायों की हदबंदी तोड़ते  बेकौफ बेटौक  सवाल
निचोड़ देते है सम्पूर्ण जीवन शक्ति को, घेर लेता है अवसाद
रिश्तो की अहमियत होती है  शर्मो ह्या से
गर्माहट होती  है  आपसी स्नेह-सम्मान से
इन हदों का दिन ब  दिन टूटना-बिखरना
बहा रहा है बनी बनाई प्रम्परायों को
कुछ निहित स्वार्थ, कुछ व्यक्ति -वाद
हमारा अपनी हदों को न  संभाल  पाना
तार तार कर रहा है आपसी संबंधो को
हर रिश्ता चरमराया, मीडिया के दरबार में
हम सब पूछे अपने आप से एक सवाल
क्या कमी थी हमारी सभ्यता और संस्कार में
विनोद पासी "हंसकमल"

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