Saturday, 24 August 2013

आज की औरत


आज की औरत
न सबला है न अबला है
न देवी है न डायन है
न कमज़ोर है न सशक्त है
न बंधन में रहना चाहती है
न स्वछंद हवा में उड़ना चाहती है

वो दूसरो के जख्म उधेड़ती भी है
और अपने जख्म छुपाती भी है
वो दया और करूणा की मूर्ति नहीं
वो प्रताड़ित करना भी जानती है
वो हमदर्दी चाहती है हमदर्द नहीं
अपने हक याद है, ज़िमेदारियां नहीं

वो होटों को सिलती नहीं
वक़्त आने पर ज़हर भी उगलती है
वो साथ रह कर भी
एक अलग ज़िन्दगी जीती है
अब उसमे नारी संपन्न गुण नहीं
अब वो कंधे से कन्धा नहीं मिलाती
अब वो सीधे जवाब तलब करती है

उसके अड़ियल गरूरपण से
हर तरफ घर परिवार टूट रहे है
पुरुषो का भी आत्मबल टूट रहा है
उसे अपनी नारी तुल्य मूल्यों
का भान भी नहीं, उसे लगता है
उसका यह पल बहुत सुंदर है

आज की औरत पिस रही है दबाबो में
सान्त्वना भी चाहती है पर
जीना चाहती है एक औरत की तरह
पर चाहकर भी नारी बन नहीं पाती

5 comments:

  1. bahut khoobsoorati se aaj kii naari aur samaj ke antardwandwa ko shabdon me peeroya hai..

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    1. wah Neeraj bhai jee, apka comment pad kar bahut accha laga

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  2. आज की नारी अपनी गरिमा को भूल गई है आगे बढने की होड़ मे नारी सुलभ गुणों को भूलती जा रही है



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    1. kavita jee,

      meri rachna mein apne bhartiya naari kee peeda ko mahsoos kiya, yahi mere liye bahut hai

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  3. Purushottam Sharma14 October 2014 at 13:36

    Very well articulated thoughts on contemporary women. Congrats Vinod ji.

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