आज की औरत
न सबला है न अबला है
न देवी है न डायन है
न कमज़ोर है न सशक्त है
न बंधन में रहना चाहती है
न स्वछंद हवा में उड़ना चाहती है
वो दूसरो के जख्म उधेड़ती भी है
और अपने जख्म छुपाती भी है
वो दया और करूणा की मूर्ति नहीं
वो प्रताड़ित करना भी जानती है
वो हमदर्दी चाहती है हमदर्द नहीं
अपने हक याद है, ज़िमेदारियां नहीं
वो होटों को सिलती नहीं
वक़्त आने पर ज़हर भी उगलती है
वो साथ रह कर भी
एक अलग ज़िन्दगी जीती है
अब उसमे नारी संपन्न गुण नहीं
अब वो कंधे से कन्धा नहीं मिलाती
अब वो सीधे जवाब तलब करती है
उसके अड़ियल गरूरपण से
हर तरफ घर परिवार टूट रहे है
पुरुषो का भी आत्मबल टूट रहा है
उसे अपनी नारी तुल्य मूल्यों
का भान भी नहीं, उसे लगता है
उसका यह पल बहुत सुंदर है
आज की औरत पिस रही है दबाबो में
सान्त्वना भी चाहती है पर
जीना चाहती है एक औरत की तरह
पर चाहकर भी नारी बन नहीं पाती
bahut khoobsoorati se aaj kii naari aur samaj ke antardwandwa ko shabdon me peeroya hai..
ReplyDeletewah Neeraj bhai jee, apka comment pad kar bahut accha laga
Deleteआज की नारी अपनी गरिमा को भूल गई है आगे बढने की होड़ मे नारी सुलभ गुणों को भूलती जा रही है
ReplyDeletekavita jee,
Deletemeri rachna mein apne bhartiya naari kee peeda ko mahsoos kiya, yahi mere liye bahut hai
Very well articulated thoughts on contemporary women. Congrats Vinod ji.
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