Tuesday, 17 September 2013

शब्द

कभी कभी तुम्हारे  शब्द शूल से चुभते है मुझे
कभी कभी तुम्हारे  शब्द बहुत रुलाते है मुझे
कभी कभी तुम्हारे शब्द बहुत हँसाते  है मुझे
कभी कभी यह  शब्द फलसफा  बताते है मुझे
यह शब्द बहुत निशब्द कर जाते है कभी कभी
यह शब्द  न बोल कर भी बहुत कुछ कहते है
यह शब्द कभी  अमृत तो कभी  विष बन जाते है
काश में इन शब्दों का मतलब  न जान पाता  कभी
न कभी महसूस करता इनकी गहरी चोट या पीढ़ा
जिंदगी कितनी सरल हो जाती     जीने के लिए

विनोद पासी "हंसकमल"

Saturday, 24 August 2013

आज की औरत


आज की औरत
न सबला है न अबला है
न देवी है न डायन है
न कमज़ोर है न सशक्त है
न बंधन में रहना चाहती है
न स्वछंद हवा में उड़ना चाहती है

वो दूसरो के जख्म उधेड़ती भी है
और अपने जख्म छुपाती भी है
वो दया और करूणा की मूर्ति नहीं
वो प्रताड़ित करना भी जानती है
वो हमदर्दी चाहती है हमदर्द नहीं
अपने हक याद है, ज़िमेदारियां नहीं

वो होटों को सिलती नहीं
वक़्त आने पर ज़हर भी उगलती है
वो साथ रह कर भी
एक अलग ज़िन्दगी जीती है
अब उसमे नारी संपन्न गुण नहीं
अब वो कंधे से कन्धा नहीं मिलाती
अब वो सीधे जवाब तलब करती है

उसके अड़ियल गरूरपण से
हर तरफ घर परिवार टूट रहे है
पुरुषो का भी आत्मबल टूट रहा है
उसे अपनी नारी तुल्य मूल्यों
का भान भी नहीं, उसे लगता है
उसका यह पल बहुत सुंदर है

आज की औरत पिस रही है दबाबो में
सान्त्वना भी चाहती है पर
जीना चाहती है एक औरत की तरह
पर चाहकर भी नारी बन नहीं पाती

Sunday, 16 June 2013

आज मन बहुत उचाट है






मत पूछो मेरे मन का हाल
मत पूछो मेरे घर का हाल
मत पूछो  ऑफिस का हाल
मत पूछो मुझसे कुछ भी आज
आज मन बहुत उचाट है
आज मन बहुत उचाट है


क्या अवसाद कह नहीं पाऊँ
कुछ बात हो तो कह भी पाऊँ
मन में कुछ बेचैनी  पाऊँ 
मन में कुछ उदासी पाऊँ
पर शब्द्रो में उन्हें गढ़ न पाऊँ


न कुछ ऐसा घटा, न कुछ हुआ,
वही साथी, वही संगी, वही प्यारे,
वही ऑफिस, वही मौसम, 
वही चाँद-सूरज, वही है तारे
वही पक्षी, वही ताल किनारे
पर कुछ है कि मन कुछ उचाट है

होता होगा औरो के साथ भी
पर मेरा अनुभव है कुछ नया
कोई कमी नहीं जीवन में
फिर भी मन क्यों  उचाट है
शायद इसको भी कभी कभी
ग़मगीन होने की  कुलबुलाहट होती होगी
शायद इसको  कुछ टूट जाने का
कुछ छूट जाने का पूर्वाग्रह होता होगा


पर अभी तो बस यह  उचाट है
आज मन बहुत उचाट है



 

जीवन चक्र



जानते हुए भी कि  मुकरर है सांसे
दुआये करने लगते है अपनी  
और दूसरो की दीर्घ आयु  की......
लम्बी उम्र क्या  पैमाना है
जो आया है उसको तो  जाना है


फिर  उम्र हो कितनी लम्बी
कौन करेगा इसकी गिनती
उम्र वही जो कुछ कर जाये
सकरात्मक जिंदगी जी जाये
लोगों के दिलो दिमाग में,
बस जाये, उनकी धडकनों में


असरदार दुयाएँ होती तो पुनर्जनम क्यों  होते
असरदार दुयाएँ होती तो चिकित्सक क्यों होते
असरदार दुयाएँ होती वृद्ध शरीर बोझ न होते
असरदार दुयाएँ होती थी, तो हर तरफ
वृद्ध  तन और बदसूरत सूरते  होती,
नन्हे फ़रिश्ते और नन्ही परियां कहाँ
मिलती देखने को, संसार कैसे चलता


जनता दुआ करती  है धर्मस्थलो  में
धर्माधिकारी जाते है वातानुकूलित हस्पताल
उनसे करीब भला और कौन होगा खुदा के
जो दुनिया जहान को ज्ञान देते फिरते है 
पर उन्हें भी इस परम सत्य का ज्ञान है
की सांसो का चलना ही जीवन है 





जीवन चक्र चलता  है बस सांसो पर
अगर कहीं कोई स्वर्ग होता तो
क्यों न होते “वो” बैचैन जाने को
उन्हें तो बस तुम्हे स्वर्ग का सपना दिखा
तुम्हारा पैसा और दौलत अपने नाम करनी है



विनोद पासी हंसकमल


Thursday, 13 June 2013

देह की आज़ादी- सुधा अरोड़ा



देह की आज़ादी

अकेली औरत
कभी नहीं भूल पाती
जाड़े के वो ठिठुरते दिन
और ठण्ड से जमी रातें
जब प्यार को
देह से बाँटने के बाद
बगल में पड़े पति के
शुरुआती खर्राटों   की
धीमी से आहट सुनकर
वह हल्के से उसका हाथ
अपने बदन से हटाती थी
की उसकी नींद में खलल डाले
बगैर वह उठे और पहन से कपडे अपने
पर ज़रा सा सरकते हुए ही
और कस जाती थी
पति की बाँहों की जकडन
और कमर घेर लेती थी उसकी टाँगे
सर्दी के रात को ठिठुरते
कम्बल को कसने की नाकाम कोशिश में
वो कहीं न कहीं उद्धरती चली जाती थी
और सारी रात यूं ही ठंडी हवा से
आंख मिचोली करते बीत जाती थी

वर्फीली रात को रात भर अपनी देह में समाकर
सुबह शिला सी अकड़ी देह लेकर भी
औरत अपने भीतर मुस्काती थी
ऑंखें नाम तो जाती थी
अपने पति के प्यार पर गर्व से फूल जाती
जो उसे नागपाश में जकड़े बिना
पल भर के लिए भी सो नहीं पाता  था
पांच दिन की कौन कहे
पांच मिनट के लिए भी छोड़ नहीं पाता 
***


पांच साल बाद
एक दिन उसने ऐसा छोड़ा
की  सबने कहा – तू भी छोड़ दे उसे
किसी और का हाथ थाम ले
पहाड़ सी ज़िन्दगी सामने पड़ी है
और ठीठोली करता समाज
कितनो को जवाब देगी देगी तू
यह उम्र निकल गयी
तो कोई नहीं देगा आवाज

उसे थामने को आगे बड़े
सामने थे कई हाथ
औरत ठिठकी, थमी, सोचा,
अपने को  भीतर तक टहोका,
उसके भीतर कई रातें बजती हैं
और वह कांप जाती है
उसे नहीं चाहिए एक और नागपाश,
वर्फीली हवा में देह की  ठिठुरन
टांगो  और बाँहों में मजबूती से कैद
अपनी निर्वस्त्र देह

वश कडकती ठण्ड की रात में
सर्द  हवायों को परे धकेलती
रजाई कस कर औद्द लेती है
और उस गर्माहट में अपनी देह को
महफूज़ पाती है
अकेली औरत
रात भर कपडे पहनकर
सोने की आज़ादी चाहती है

सुधा अरोड़ा जी की कविता रचना समय के सोजन्य से ली गई

Wednesday, 12 June 2013

मेरे कुछ ज़ज्बात है देने को



मेरे कुछ ज़ज्बात है देने को

आँखों से ओझल होने  से  पहले,
कुछ  देना चाहता हूँ  
पर  सोच के परेशां हूँ की  क्या दूं....
सब कुछ तुम्हारे पास है, धन दौलत और वैभव  
जो दूंगा वो शायद तुम्हारे लायक न हो
हो सकता है उससे उत्तम  वस्तु  तुम्हारे पास हो
या इन्हें रखने की कोई जगह भी न हो,
ज़मीन जायदाद और पैसा तो ले लोगो
पर क्या मेरे ज़ज्बात भी लोगो ?

मेरे पास मात्रभाषा में छपी बहुत किताबे है
कुछ लेखको के हस्ताक्षरों के साथ,
कुछ  कवितायेँ  भी है मेरी ही  लिखी
पर तुम्हे तो मात्रभाषा आती  नहीं....
कैसे समझोगे वो ज़ज्बात जो पिरोये है मैंने
कैसे समझोगे इन भावनायों की गहराई को
कहाँ समय मिलेगा इन्हें पढने और समझने में ?
 

तुम्हारी बात और है, तुम वर्षो से रहे हो विदेश
पर जिन्हें यह भाषा  समझ आती है  
उन्हें भी कहाँ फुर्सत है इन्हें पढने की,
इन्हें समझने  की, इनका अर्थ जानने की

देखो तो यह सब  बस कबाड़ है  
पर कभी हिम्मत ही नहीं हूँ
फेंकने की, तुम इन्हें फेंक सकोगे
क्योंकि नहीं जुडी है कोई तुम्हारी
यादें  इनसे........ 


कुछ और भी है जो मैं देना चाहता हूँ
ढेरो गीत  और फिल्मे है उस युग की
जिसमे पल कर हम बड़े  हुए है
हजारो गीत है जिनसे जुड़े है मेरे  जज़्बात
यह सुन तो सकते हो, पर शायद समझ न पाओ

पर क्या कभी वक़्त मिलेगा मेरी पसंद को
सुनने और समझने का, इसका ही अंदेशा है
क्योंकि तुम्हारे संग  भी  तो जुड़ रही है
वो  सेंकडो फिल्मे और  विदेशी  धुनें,
जो हमारे दिल  को कभी छू भी न पायी ......

.
कभी तुम्हे भी तो  छोड़ना होगा यह सब ..
अपनी अगली पीढ़ी के लिए
जो शायद उनके लिए भी हो कबाड़
तभी समझोगे मेरी इस बेचैनी का सबब
तभी समझोगे मेरी इस बेचैनी का सबब  

विनोद पासी हंसकमल