मेरे कुछ ज़ज्बात है देने को
आँखों से ओझल होने से पहले,
कुछ देना
चाहता हूँ
पर सोच
के परेशां हूँ की क्या दूं....
सब कुछ तुम्हारे पास है, धन दौलत और वैभव
जो दूंगा वो शायद तुम्हारे लायक न हो
हो सकता है उससे उत्तम वस्तु तुम्हारे पास हो
या इन्हें रखने की कोई जगह भी न हो,
ज़मीन जायदाद और पैसा तो ले लोगो
पर क्या मेरे ज़ज्बात भी लोगो ?
मेरे पास मात्रभाषा में छपी बहुत किताबे है
कुछ लेखको के हस्ताक्षरों के साथ,
कुछ कवितायेँ
भी है मेरी ही लिखी
पर तुम्हे तो मात्रभाषा आती नहीं....
कैसे समझोगे वो ज़ज्बात जो पिरोये है मैंने
कैसे समझोगे इन भावनायों की गहराई को
कहाँ समय मिलेगा इन्हें पढने और समझने में ?
तुम्हारी बात और है, तुम वर्षो से रहे हो विदेश
पर जिन्हें यह भाषा समझ आती है
उन्हें भी कहाँ फुर्सत है इन्हें पढने की,
इन्हें समझने
की, इनका अर्थ जानने की
देखो तो यह सब बस कबाड़ है
पर कभी हिम्मत ही नहीं हूँ
फेंकने की, तुम इन्हें फेंक सकोगे
क्योंकि नहीं जुडी है कोई तुम्हारी
यादें
इनसे........
कुछ और भी है जो मैं देना चाहता हूँ
ढेरो गीत और फिल्मे है उस युग की
जिसमे पल कर हम बड़े हुए है
हजारो गीत है जिनसे जुड़े है मेरे जज़्बात
यह सुन तो सकते हो, पर शायद समझ न पाओ
पर क्या कभी वक़्त मिलेगा मेरी पसंद को
सुनने और समझने का, इसका ही अंदेशा है
क्योंकि तुम्हारे संग भी तो
जुड़ रही है
वो
सेंकडो फिल्मे और विदेशी धुनें,
जो हमारे दिल को कभी छू भी न पायी ......
.
कभी तुम्हे भी तो छोड़ना होगा यह सब ..
अपनी अगली पीढ़ी के लिए
जो शायद उनके लिए भी हो कबाड़
तभी समझोगे मेरी इस बेचैनी का सबब
तभी समझोगे मेरी इस बेचैनी का सबब
विनोद पासी “हंसकमल”